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कृष्ण का वरदान — “कलीयुग में श्याम रूप में पूजे जाओगे”
खाटू श्याम जी को कलीयुग के कृष्ण और भक्तों के शीघ्र कृपास्वरूप कहा जाता है।
श्याम बाबा का संदेश स्पष्ट है:
“जो हारा है, वही मेरा है।” हर दुखी, निराश और आश्रित मन को यहाँ आशा का पुनर्जन्म मिलता है।
कथा – बारबारिक का त्याग और कृष्ण का आशीर्वाद
बारबारिक (घटोत्कच के पुत्र) के पास अतुलनीय शक्ति थी। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि युद्ध में कमज़ोर पक्ष का साथ देंगे। कृष्ण ने उनकी दृढ़ता, सत्यवादिता और अपार त्याग देखकर कहा:
“बारबारिक, तुम्हारा वीर–त्याग अद्वितीय है। कलीयुग में तुम ‘श्याम’ नाम से पूजे जाओगे। जिनके पास कोई न होगा, तुम उनके सहारा बनोगे।”
बारबारिक का शीश आज खाटू में विराजता है — इसीलिए श्याम बाबा को “शीश के दानी” भी कहा जाता है।
मनोकामना–पत्र (Wish Letter) चढ़ाएँ : केवल एक इच्छा लिखें , मन पूरी तरह निश्छल हो , पत्र चढ़ाते समय बाबा से हृदय–संवाद करें , इच्छा पूरी होने पर धन्यवाद दर्शन अवश्य करें , यह सेवा श्याम भक्त पर सीधी कृपा–अनुभूति प्रदान करती है।
मंदिर की दहलीज़ पर ही गहरी राहत और मन की हल्कापन , बाबा के दर्शनों में दया और सहारा का अद्भुत भाव , श्याम ध्वज और कीर्तन से पूरे वातावरण में ऊर्जा का संचार ,मनोकामना–पत्र चढ़ाते ही भीतर विश्वास और संतोष
फाल्गुनी मेला (सबसे प्रसिद्ध) , जन्मोत्सव / प्राकट्य दिवस , एकादशी विशेष दर्शन , श्याम भजन संध्या और जागरण
भावार्थ (Spiritual Essence)
“जहाँ सबने साथ छोड़ा, वहाँ श्याम बाबा ने हाथ थामा।
वे कलीयुग के सच्चे सहारा — हार को जीत में बदल देने वाले भगवान हैं।”
उत्पत्ति व कथा – भक्तत्व, बल और करुणा का संगम
चारभुजा जी का यह दिव्य मंदिर राजसमंद जिले के गढ़बोर में स्थित है और इसे “मेवाड़ का रणछोड़जी धाम” भी कहा जाता है। कथा के अनुसार, यह विग्रह स्वयं पांडवों के वंशज भीलू राजा गंगूजी को प्राप्त हुआ। भगवान ने अपने चार–भुजा स्वरूप में दर्शन देकर यह स्थापित किया कि— “जो भी निष्कपट हृदय से शरण ले, उसे श्रीहरि कभी नहीं छोड़ते।” यही कारण है कि यहाँ का वातावरण भक्ति, वीरता, संरक्षण और दैवीय करुणा की ऊर्जा से भरा है।
चारभुजा जी का स्वरूप
चारभुजा जी विष्णु–स्वरूप में हैं, जिनके चार हाथों में दैवीय आयुध—
यह संयोजन भक्त को साहस + संरक्षण + प्रेम की त्रिवेणी प्रदान करता है।
स्थान: गढ़बोर गाँव, राजसमंद जिला
निकट शहर: राजसमंद – 28 किमी, नाथद्वारा – 35 किमी, उदयपुर – 90 किमी
निकटतम स्टेशन/रेलवे: राजसमंद / मारवाड़ जंक्शन
एयरपोर्ट: उदयपुर (लगभग 95 किमी)
स्थानीय परिवहन: बस, टैक्सी, लोकल जीप
सुबह दर्शन: 7:30 AM – 11:30 AM | शाम दर्शन: 4:00 PM – 8:00 PM
भीड़: अमावस्या, पूर्णिमा और त्यौहारों पर अधिक
जन्माष्टमी , रामधुन एवं रथयात्रा उत्सव , अन्नकूट दर्शन , पूर्वज दिवस और भील परंपराओं से जुड़े विशेष पर्व , झूलन उत्सव
जहाँ श्याम स्वयं व्यापारियों के हितैषी बनते हैं
मंदफिया स्थित सावरिया सेठ जी का यह धाम व्यापार, धन, सौदा और आर्थिक संरक्षण के लिए अत्यंत प्रसिद्ध है। श्याम का यह स्वरूप “सेठ” कहलाता है — अर्थात वह दिव्य व्यापारी जो हर व्यापारी के सौदे और कर्म की रक्षा करते हैं।
कथा – स्वयंप्रकट श्याम स्वरूप
कहते हैं यह विग्रह स्वयंप्रकट है और इसकी स्थापना की प्रेरणा नाथद्वारा श्रीनाथजी से जुड़ी है। सेवा, श्रृंगार और भोग की शैली भी नाथद्वारा परम्परा के समान है— मधुर, भव्य और व्यापारी–परिवार जैसी आत्मीयता से भरी हुई।
भक्तों का विश्वास है कि:
“सावरिया सेठ व्यापार में जोखिम को संरक्षण,
और सौदे में उतार–चढ़ाव को स्थिरता में बदल देते हैं।”
यही कारण है कि देशभर के व्यापारी अपने खाते, बिल, टेंडर, फाइलें और सौदा–ड्राफ्ट इनके चरणों में रखते हैं।
व्यापार फ़ाइल / प्रोजेक्ट की प्रति चरणों में स्पर्श कराएँ
व्यापारी अपने:
सावरिया सेठ के चरणों में स्पर्श कराते हैं।
इससे सौदे में शुभ संकेत, क्लाइंट की सकारात्मकता और आर्थिक सुरक्षा की अनुभूति होती है।
मंदिर में प्रवेश करते ही “सुरक्षा और विश्वास” की गहरी भावना , भव्य श्रृंगार और संगीत से सकारात्मक ऊर्जा , व्यापारिक चिंता तुरंत हल्की महसूस होती है , सेठ जी की दृष्टि में “रोज़गार और सम्पन्नता की कृपा” का अनुभव
स्थान: मंदफिया, चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) , निकटतम शहर: चित्तौड़गढ़ (30 किमी), नाथद्वारा (60 किमी)
निकट स्टेशन: चित्तौड़गढ़ , विशेष: यह धाम राष्ट्रीय राजमार्ग के निकट स्थित है, यात्रियों के लिए सहज पहुँच
प्रत्येक एकादशी , श्रीकृष्ण जन्माष्टमी , दीपावली / धनतेरस विशेष पूजन , नववर्ष व्यापार–आरंभ पूजन
उत्पत्ति / कथा — गोवर्धनधारी कृष्ण का स्वयंप्रकट बाल–स्वरूप श्रीनाथजी वह दिव्य स्वरूप हैं जो गोवर्धन पर्वत से स्वयं प्रकट हुए। उनका यह रूप गोवर्धनधारी बाल–कृष्ण का है, बाएँ हाथ में उठाया हुआ पर्वत और मासूम, जीवंत बाल–चरण।
विशेष बात: यहाँ पूजा नहीं, सेवा होती है। माने भगवान को माता–पिता की तरह सँवारा जाता है, जागरण, स्नान, भोजन, शृंगार, खेल, विश्राम… सब कुछ “बालक कृष्ण” की दिनचर्या के अनुसार। इसीलिए नाथद्वारा का यह मंदिर “हवेली” कहलाता है, जहाँ ठाकुरजी घर के स्वामी हैं और भक्त सेवक।
मंदिर की विशिष्टता
झलक–दर्शन में दिव्य रोमांच , शृंगार के विविध रूपों में जीवंत बाल–कृष्ण , हवेली की घंटियों व वंशी की ध्वनि से गहरी माधुर्य–ऊर्जा , “प्रभु घर में हैं” यह भाव अत्यंत प्रबल
श्रीनाथजी के दर्शन दिन में कई बार होते हैं,
लेकिन प्रत्येक केवल कुछ मिनटों की झलक:
(भक्त समय से पहले पहुँचकर हवेली वातावरण में डूब जाते हैं।)
स्थान: नाथद्वारा, उदयपुर से लगभग 45 किमी
निकटतम हवाई अड्डा: उदयपुर (महारााणा प्रताप एयरपोर्ट)
निकटतम स्टेशन: राजसमंद / उदयपुर
स्थानीय परिवहन: टैक्सी, बस, निजी वाहन
निकट दर्शन स्थल: एकलिंगजी , हाल्दीघाटी , नवनीत प्रिया मंदिर
अन्नकूट महोत्सव (दीपावली): पूरे वर्ष का सबसे भव्य उत्सव अनेक प्रकार के भोग, शृंगार और दिव्य उत्साह।
नंद महोत्सव: कृष्ण जन्म के बाद का अत्यंत मधुर पर्व झाँकियाँ, नृत्य, भोग और उत्सव का अनोखा संगम।
अन्य: गोवर्धन पूजा, फाग महोत्सव (होली), पुष्टिमार्ग के सभी मुख्य उत्सव
जहाँ साक्षात श्रीकृष्ण स्वरूप के दर्शन होते हैं
जयपुर के हृदय में स्थित गोविंद देव जी का मंदिर राजस्थान का सबसे जीवंत कृष्ण–धाम माना जाता है।
यहाँ के दर्शन को “साक्षात जीवंत स्वरूप” कहा जाता है— क्योंकि भगवान की प्रतिमा में अद्भुत प्रभा, आकर्षण और तेज अनुभव होता है। राजस्थान के कछवाहा राजवंश ने इन्हें अपना राज–देवता माना,
इसीलिए यह मंदिर राजसी ऐश्वर्य, गरिमा और भक्ति का सुंदर संगम है।
कथा – वज्रनाभ द्वारा निर्मित मूल स्वरूप, जो जयपुर तक पहुँचापरंपरा के अनुसार: यह विग्रह वज्रनाभ, श्रीकृष्ण के प्रपौत्र द्वारा बनाया गया था, और यह कृष्ण के वास्तविक स्वरूप पर आधारित है। मुग़ल काल में इनकी सुरक्षा हेतु इन्हें वृंदावन से आमेर, और फिर जयपुर लाया गया। महाराजा सवाई जयसिंह ने शहर का निर्माण इस प्रकार किया कि गोविंद देव जी का दर्शन उनके राजमहल से सीधा हो सके। इसीलिए इन्हें “जयपुर के राज–देवता” कहा जाता है।
श्रीरंग (अलंकृत दर्शनों) के समय शुभ संकल्प लिखकर जेब में रखें।
इससे मनोवांछित कार्यों में:
यह सेवा विशेष रूप से करियर, सरकारी परीक्षाओं, व्यापार, और पद–संबंधित कार्यों में अत्यंत प्रभावी मानी जाती है।
हर झाँकी में प्रभु के मुख से जीवंत मुस्कान , आरती के समय अद्भुत दिव्य–ऊर्जा , भीड़ के बीच भी अनोखा शांत भाव , राजसी शृंगार और संगीत जो मन को गहराई से छू ले.
स्थान: सिटी पैलेस परिसर, जयपुर
निकटतम स्टेशन: जयपुर जंक्शन
निकटतम एयरपोर्ट: जयपुर अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डा
दर्शन: दिन में कई झाँकियाँ – प्रत्येक झाँकी में भिन्न शृंगार
झूलन उत्सव: शृंगार और मधुर कीर्तन का अद्भुत महोत्सव।
जन्माष्टमी: अत्यंत भव्य अलंकार, झाँकियाँ और संपूर्ण राजसी उत्सव।
अन्य: कार्तिक मास, अन्नकूट दर्शन, वसंत पंचमी शृंगार
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