A sacred space celebrating devotion, history, and spiritual connection.
कृष्ण का वरदान — “कलीयुग में श्याम रूप में पूजे जाओगे”
खाटू श्याम जी को कलीयुग के कृष्ण और भक्तों के शीघ्र कृपास्वरूप कहा जाता है।
श्याम बाबा का संदेश स्पष्ट है:
“जो हारा है, वही मेरा है।” हर दुखी, निराश और आश्रित मन को यहाँ आशा का पुनर्जन्म मिलता है।
कथा – बारबारिक का त्याग और कृष्ण का आशीर्वाद
बारबारिक (घटोत्कच के पुत्र) के पास अतुलनीय शक्ति थी। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि युद्ध में कमज़ोर पक्ष का साथ देंगे। कृष्ण ने उनकी दृढ़ता, सत्यवादिता और अपार त्याग देखकर कहा:
“बारबारिक, तुम्हारा वीर–त्याग अद्वितीय है। कलीयुग में तुम ‘श्याम’ नाम से पूजे जाओगे। जिनके पास कोई न होगा, तुम उनके सहारा बनोगे।”
बारबारिक का शीश आज खाटू में विराजता है — इसीलिए श्याम बाबा को “शीश के दानी” भी कहा जाता है।
मनोकामना–पत्र (Wish Letter) चढ़ाएँ : केवल एक इच्छा लिखें , मन पूरी तरह निश्छल हो , पत्र चढ़ाते समय बाबा से हृदय–संवाद करें , इच्छा पूरी होने पर धन्यवाद दर्शन अवश्य करें , यह सेवा श्याम भक्त पर सीधी कृपा–अनुभूति प्रदान करती है।
मंदिर की दहलीज़ पर ही गहरी राहत और मन की हल्कापन , बाबा के दर्शनों में दया और सहारा का अद्भुत भाव , श्याम ध्वज और कीर्तन से पूरे वातावरण में ऊर्जा का संचार ,मनोकामना–पत्र चढ़ाते ही भीतर विश्वास और संतोष
फाल्गुनी मेला (सबसे प्रसिद्ध) , जन्मोत्सव / प्राकट्य दिवस , एकादशी विशेष दर्शन , श्याम भजन संध्या और जागरण
भावार्थ (Spiritual Essence)
“जहाँ सबने साथ छोड़ा, वहाँ श्याम बाबा ने हाथ थामा।
वे कलीयुग के सच्चे सहारा — हार को जीत में बदल देने वाले भगवान हैं।”
उत्पत्ति व कथा – भक्तत्व, बल और करुणा का संगम
चारभुजा जी का यह दिव्य मंदिर राजसमंद जिले के गढ़बोर में स्थित है और इसे “मेवाड़ का रणछोड़जी धाम” भी कहा जाता है। कथा के अनुसार, यह विग्रह स्वयं पांडवों के वंशज भीलू राजा गंगूजी को प्राप्त हुआ। भगवान ने अपने चार–भुजा स्वरूप में दर्शन देकर यह स्थापित किया कि— “जो भी निष्कपट हृदय से शरण ले, उसे श्रीहरि कभी नहीं छोड़ते।” यही कारण है कि यहाँ का वातावरण भक्ति, वीरता, संरक्षण और दैवीय करुणा की ऊर्जा से भरा है।
चारभुजा जी का स्वरूप
चारभुजा जी विष्णु–स्वरूप में हैं, जिनके चार हाथों में दैवीय आयुध—
यह संयोजन भक्त को साहस + संरक्षण + प्रेम की त्रिवेणी प्रदान करता है।
स्थान: गढ़बोर गाँव, राजसमंद जिला
निकट शहर: राजसमंद – 28 किमी, नाथद्वारा – 35 किमी, उदयपुर – 90 किमी
निकटतम स्टेशन/एयरपोर्ट: रेलवे: राजसमंद / मारवाड़ जंक्शन
एयरपोर्ट: उदयपुर (लगभग 95 किमी)
स्थानीय परिवहन: बस, टैक्सी, लोकल जीप
सुबह दर्शन: 7:30 AM – 11:30 AM | शाम दर्शन: 4:00 PM – 8:00 PM
भीड़: अमावस्या, पूर्णिमा और त्यौहारों पर अधिक
जन्माष्टमी , रामधुन एवं रथयात्रा उत्सव , अन्नकूट दर्शन , पूर्वज दिवस और भील परंपराओं से जुड़े विशेष पर्व , झूलन उत्सव
जहाँ श्याम स्वयं व्यापारियों के हितैषी बनते हैं
मंदफिया स्थित सावरिया सेठ जी का यह धाम व्यापार, धन, सौदा और आर्थिक संरक्षण के लिए अत्यंत प्रसिद्ध है। श्याम का यह स्वरूप “सेठ” कहलाता है — अर्थात वह दिव्य व्यापारी जो हर व्यापारी के सौदे और कर्म की रक्षा करते हैं।
कथा – स्वयंप्रकट श्याम स्वरूप
कहते हैं यह विग्रह स्वयंप्रकट है और इसकी स्थापना की प्रेरणा नाथद्वारा श्रीनाथजी से जुड़ी है। सेवा, श्रृंगार और भोग की शैली भी नाथद्वारा परम्परा के समान है— मधुर, भव्य और व्यापारी–परिवार जैसी आत्मीयता से भरी हुई।
भक्तों का विश्वास है कि:
“सावरिया सेठ व्यापार में जोखिम को संरक्षण,
और सौदे में उतार–चढ़ाव को स्थिरता में बदल देते हैं।”
यही कारण है कि देशभर के व्यापारी अपने खाते, बिल, टेंडर, फाइलें और सौदा–ड्राफ्ट इनके चरणों में रखते हैं।
व्यापार फ़ाइल / प्रोजेक्ट की प्रति चरणों में स्पर्श कराएँ
व्यापारी अपने:
सावरिया सेठ के चरणों में स्पर्श कराते हैं।
इससे सौदे में शुभ संकेत, क्लाइंट की सकारात्मकता और आर्थिक सुरक्षा की अनुभूति होती है।
मंदिर में प्रवेश करते ही “सुरक्षा और विश्वास” की गहरी भावना , भव्य श्रृंगार और संगीत से सकारात्मक ऊर्जा , व्यापारिक चिंता तुरंत हल्की महसूस होती है , सेठ जी की दृष्टि में “रोज़गार और सम्पन्नता की कृपा” का अनुभव
स्थान: मंदफिया, चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) , निकटतम शहर: चित्तौड़गढ़ (30 किमी), नाथद्वारा (60 किमी)
निकट स्टेशन: चित्तौड़गढ़ , विशेष: यह धाम राष्ट्रीय राजमार्ग के निकट स्थित है, यात्रियों के लिए सहज पहुँच
प्रत्येक एकादशी , श्रीकृष्ण जन्माष्टमी , दीपावली / धनतेरस विशेष पूजन , नववर्ष व्यापार–आरंभ पूजन
उत्पत्ति / कथा — गोवर्धनधारी कृष्ण का स्वयंप्रकट बाल–स्वरूप श्रीनाथजी वह दिव्य स्वरूप हैं जो गोवर्धन पर्वत से स्वयं प्रकट हुए। उनका यह रूप गोवर्धनधारी बाल–कृष्ण का है, बाएँ हाथ में उठाया हुआ पर्वत और मासूम, जीवंत बाल–चरण।
विशेष बात: यहाँ पूजा नहीं, सेवा होती है। माने भगवान को माता–पिता की तरह सँवारा जाता है, जागरण, स्नान, भोजन, शृंगार, खेल, विश्राम… सब कुछ “बालक कृष्ण” की दिनचर्या के अनुसार। इसीलिए नाथद्वारा का यह मंदिर “हवेली” कहलाता है, जहाँ ठाकुरजी घर के स्वामी हैं और भक्त सेवक।
मंदिर की विशिष्टता
झलक–दर्शन में दिव्य रोमांच , शृंगार के विविध रूपों में जीवंत बाल–कृष्ण , हवेली की घंटियों व वंशी की ध्वनि से गहरी माधुर्य–ऊर्जा , “प्रभु घर में हैं” यह भाव अत्यंत प्रबल
श्रीनाथजी के दर्शन दिन में कई बार होते हैं,
लेकिन प्रत्येक केवल कुछ मिनटों की झलक:
(भक्त समय से पहले पहुँचकर हवेली वातावरण में डूब जाते हैं।)
स्थान: नाथद्वारा, उदयपुर से लगभग 45 किमी
निकटतम हवाई अड्डा: उदयपुर (महारााणा प्रताप एयरपोर्ट)
निकटतम स्टेशन: राजसमंद / उदयपुर
स्थानीय परिवहन: टैक्सी, बस, निजी वाहन
निकट दर्शन स्थल: एकलिंगजी , हाल्दीघाटी , नवनीत प्रिया मंदिर
अन्नकूट महोत्सव (दीपावली): पूरे वर्ष का सबसे भव्य उत्सव अनेक प्रकार के भोग, शृंगार और दिव्य उत्साह।
नंद महोत्सव: कृष्ण जन्म के बाद का अत्यंत मधुर पर्व झाँकियाँ, नृत्य, भोग और उत्सव का अनोखा संगम।
अन्य: गोवर्धन पूजा, फाग महोत्सव (होली), पुष्टिमार्ग के सभी मुख्य उत्सव
जहाँ साक्षात श्रीकृष्ण स्वरूप के दर्शन होते हैं
जयपुर के हृदय में स्थित गोविंद देव जी का मंदिर राजस्थान का सबसे जीवंत कृष्ण–धाम माना जाता है।
यहाँ के दर्शन को “साक्षात जीवंत स्वरूप” कहा जाता है— क्योंकि भगवान की प्रतिमा में अद्भुत प्रभा, आकर्षण और तेज अनुभव होता है। राजस्थान के कछवाहा राजवंश ने इन्हें अपना राज–देवता माना,
इसीलिए यह मंदिर राजसी ऐश्वर्य, गरिमा और भक्ति का सुंदर संगम है।
कथा – वज्रनाभ द्वारा निर्मित मूल स्वरूप, जो जयपुर तक पहुँचापरंपरा के अनुसार: यह विग्रह वज्रनाभ, श्रीकृष्ण के प्रपौत्र द्वारा बनाया गया था, और यह कृष्ण के वास्तविक स्वरूप पर आधारित है। मुग़ल काल में इनकी सुरक्षा हेतु इन्हें वृंदावन से आमेर, और फिर जयपुर लाया गया। महाराजा सवाई जयसिंह ने शहर का निर्माण इस प्रकार किया कि गोविंद देव जी का दर्शन उनके राजमहल से सीधा हो सके। इसीलिए इन्हें “जयपुर के राज–देवता” कहा जाता है।
श्रीरंग (अलंकृत दर्शनों) के समय शुभ संकल्प लिखकर जेब में रखें।
इससे मनोवांछित कार्यों में:
यह सेवा विशेष रूप से करियर, सरकारी परीक्षाओं, व्यापार, और पद–संबंधित कार्यों में अत्यंत प्रभावी मानी जाती है।
हर झाँकी में प्रभु के मुख से जीवंत मुस्कान , आरती के समय अद्भुत दिव्य–ऊर्जा , भीड़ के बीच भी अनोखा शांत भाव , राजसी शृंगार और संगीत जो मन को गहराई से छू ले.
स्थान: सिटी पैलेस परिसर, जयपुर
निकटतम स्टेशन: जयपुर जंक्शन
निकटतम एयरपोर्ट: जयपुर अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डा
दर्शन: दिन में कई झाँकियाँ – प्रत्येक झाँकी में भिन्न शृंगार
झूलन उत्सव: शृंगार और मधुर कीर्तन का अद्भुत महोत्सव।
जन्माष्टमी: अत्यंत भव्य अलंकार, झाँकियाँ और संपूर्ण राजसी उत्सव।
अन्य: कार्तिक मास, अन्नकूट दर्शन, वसंत पंचमी शृंगार
उत्पत्ति व कथा – अवतार का पवित्र क्षण
मथुरा की इस पावन भूमि पर माता देवकी और वासुदेव के आठवें पुत्र रूप में भगवान श्रीकृष्ण ने अवतार लिया। कंस की कारागार में जन्म लेने वाले विग्रह ने संसार को यह संदेश दिया कि— “धर्म की रक्षा के लिए भगवान स्वयं अवतरित होते हैं।”
यह स्थल आज भी: अधर्म के नाश, सत्य और न्याय की स्थापना, तथा दैवीय हस्तक्षेप की अनुभूति का सजीव प्रमाण है। जन्मभूमि परिसर का हर पत्थर भक्तों को भयमुक्त जीवन, धर्मनिष्ठ कर्म, और शुद्ध भक्ति का मार्ग दिखाता है।
मथुरा की जन्मभूमि पर दर्शन करने से परम्परागत रूप से यह फल प्राप्त होते हैं:
निकट स्टेशन: Mathura Junction – लगभग 2 किमी
निकट हवाई अड्डा: आगरा (AGRA Airport, 60 किमी)
लोकल परिवहन: ई–रिक्शा, ऑटो उपलब्ध
सर्वश्रेष्ठ दर्शन: सुबह 8:00 AM – 11:00 AM
शाम को संध्या आरती
महापर्व: श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, लड्डू गोपाल झूला उत्सव
भीड़ से बचने के लिए वीकडेज़ को प्राथमिकता दें
उत्पत्ति व कथा – श्याम और श्यामा का दिव्य साक्षात्कार
वृन्दावन की आनंदतरंगिणी धरा पर, महान भक्त स्वामी हरिदास जी की गहन साधना और नाद–ब्रह्म की तान पर श्यामा–श्याम ने स्वयं प्रकट होकर “बाँके बिहारी” स्वरूप में दर्शन दिए। यहाँ कृष्ण मकरंद–माधुरी के प्रतीक हैं— इतने मधुर, इतने मोहितकारी, कि लगातार दर्शन करने पर भक्त समाधि–भाव में खो जाए। इसी कारण मंदिर में दर्शन झलक–झलक कराए जाते हैं — ताकि बिहारीजी की अत्यंत माधुर्यपूर्ण छवि में भक्त पूरी तरह तल्लीन न हो जाए और लौकिक चेतना बनी रहे। इस स्थान का अभिप्राय ही है: “प्रेम में डूबो, पर खोओ मत — कृष्ण स्वयं तुम्हें संभालेंगे।”
निकट स्टेशन: Mathura Junction / Vrindavan Railway Station
स्थानीय परिवहन: ई–रिक्शा, टेम्पो, तांगे
टिप: छुट्टियों और सप्ताहांत पर भीड़ अधिक रहती है
उपयुक्त दर्शन व विशेष झाँकियाँ: सुबह की झाँकी , संध्या की झाँकी , भीड़ से बचने हेतु सुबह के समय श्रेष्ठ
वृन्दावन की होली – बिहारीजी के रंग
हिंडोला उत्सव – झूला झूलते बिहारीजी
शरद पूर्णिमा – माधुर्य–रस का चरम
(तीनों उत्सवों में मंदिर का वातावरण अत्यंत अलौकिक माना जाता है।)
उत्पत्ति व कथा – जब शालिग्राम ने स्वयं स्वरूप धारण किया
वृन्दावन के छः गोस्वामियों में से एक श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी की तपस्या, व्रत और अखंड भक्ति से प्रसन्न होकर उनके पूजनीय शालिग्राम शिला ने एक रात्रि स्वयं “राधा रमण” के रूप में प्रकट होकर दिव्य विग्रह धारण कर लिया। यह घटना वैष्णव परंपरा में अद्वितीय चमत्कार मानी जाती है— क्योंकि यह स्वयंप्रकट श्रीकृष्ण विग्रह है, मनुष्य द्वारा निर्मित नहीं। आज भी भक्त दर्शन करते समय अनुभव करते हैं कि: “यह केवल मूर्ति नहीं—स्वयं रमण–स्वरूप श्रीकृष्ण हैं।”
धाम की विशिष्टता
राधा रमण जी के विग्रह में त्रिभंग मुद्रा की मनोहर झलक , विग्रह के साथ रखा शालिग्राम — मूल स्वरूप की स्मृति , 500+ वर्षों से अखंडित चल रही महान सेवा–परम्परा , छोटा, शांत और अत्यधिक आध्यात्मिक स्पंदन वाला मंदिर परिसर
स्थान: Old Vrindavan (निर्मल व संकरे गलियों के बीच)
मंदिर आयु: 500+ वर्ष
पास के धाम: निधिवन, सेवाकुंज, राधा वल्लभ मंदिर
ब्रह्मोत्सव
राधा रमण जी के अलौकिक अभिषेक और दिव्य शृंगार का अनुपम उत्सव।
झूला यात्रा (Jhulan Yatra
रमण–रसराज श्रीकृष्ण का झूला उत्सव — वृन्दावन की सबसे मधुर परंपराओं में से एक।
अतिरिक्त पर्व:
जहाँ कान्हा ने रेत में खेलकर आनंद बरसाया
रमन रेटी का अर्थ है — “आनंद की रेत, दिव्यता का खेल”
यह वह भूमि है जहाँ बाल–गोपाल ने अपने नन्हें चरणों से रेत को पवित्र कर दिया।
कथा – श्रीकृष्ण के बाल–लीला की प्रथम धरती
यमुना के उस पार, जहां आज गोकुल स्थित है, वासुदेव जी नवजात श्रीकृष्ण को बदलकर यशोदा–मैया की गोद में सौंप आए। यही गोकुल कृष्ण के – पहले खेल, पहले कदम, पहली मुस्कान, और पहली माखन–लीला की भूमि है।
कथा है कि रमन रेटी की रेत में आज भी दिव्य स्पंदन है, मानो श्रीकृष्ण की बाल–चपलता और पवित्र आनंद अब भी वहीं बिखरे हों। भक्त यहाँ आकर अनुभव करते हैं कि— “यहाँ हवा भी गोपाल के बचपन की तरह मासूम लगती है।”
विशेष सेवा सुझाव
“रेत पर लेटकर प्रार्थना” यह सेवा अहंकार–क्षालन और मन को खाली करने का माध्यम मानी जाती है।
शरीर माँ धरती पर और मन बाल–गोपाल के चरणों में — यह क्रिया भक्त को गहरी विनम्रता, हृदय–शुद्धि और प्रेम–ऊर्जा से भर देती है।
स्थान: मथुरा से कुछ ही किलोमीटर दूरी
निकट स्टेशन: Mathura Junction
परिवहन: ऑटो, ई–रिक्शा और लोकल जीप
संलग्न धाम: नन्दभवन, ब्रह्मांड–घाट, गोपाललाल मंदिर
गोकुल अष्टमी
बल–गोपाल झूला उत्सव
ब्रज की होली (गोकुल–विशेष)
जहाँ नंद–यशोदा के लाल ने अपना शैशव बिताया
यह वही पावन धरा है जहाँ बाल–कृष्ण के कदमों की छाप आज भी हवा में महसूस होती है। नंदगाँव की पहाड़ी पर स्थित नंद भवन वह स्थान है जहाँ माँ यशोदा ने कान्हा को पाला, सँवारा और उनसे संसार को प्रेम, सरलता और आनंद का संदेश मिला।
कथा – बाल लीला का घर, प्रेम का प्रथम विद्यालय
गोकुल में कंस के अत्याचार बढ़ने पर नंद बाबा ने कृष्ण को लेकर नंदगाँव सुरक्षित स्थान पर आ बसे।
यहीं कान्हा ने अपना बचपन बिताया — माखन–चोरी , ग्वाल–बाल संग गाय चराना , बांसुरी की मधुर तान , रास–लीला की प्रथम झल , माँ यशोदा की ममतामयी डाँट और दुलार, नंदगाँव वह भूमि है जो ममता, सुरक्षा, आनंद और परिवार–प्रेम का पवित्र स्वरूप है।
विशेष सेवा सुझाव
बच्चों के नाम से ‘रुई–माखन’ का भोग
यह भोग बाल गोपाल की विशेष प्रिय सेवा मानी जाती है। भक्त विश्वास करते हैं कि इससे: बच्चों की रक्षा, स्वास्थ्य, और उज्ज्वल भविष्य , का ईश्वरीय आशीर्वाद मिलता है।
स्थान: नंदगाँव, मथुरा वृंदावन क्षेत्र
विशेषता: Hilltop Temple (ऊँची पहाड़ी पर स्थित)
निकट स्टेशन: Mathura Junction
निकट धाम: बरसाना (मात्र 7–8 किमी), गोकुल, रमन रेटी
नंदोत्सव
कृष्ण जन्म के अगले दिन — नंदगाँव का प्रमुख उत्सव।
ब्रज की होली (Lathmar Holi के समीप) बरसाना–नंदगाँव की पारंपरिक होली विश्व–विख्यात है।
अन्य: झूला उत्सव , माखन–मिश्री भोग उत्सव , कार्तिक मास उत्सव
जहाँ मन–मोहक प्रभु मन को भी अपने वश में कर लेते हैं
वृन्दावन की पहाड़ी पर स्थित मदन मोहन मंदिर वह स्थान है जहाँ श्रीकृष्ण अपने मदन–मोहन स्वरूप में विराजते हैं — एक ऐसा रूप जो कामदेव तक को मोहित कर दे, और मन को भटकने से रोककर भक्ति में स्थिर कर दे।
यह धाम मन की चंचलता पर विजय पाने का आध्यात्मिक केन्द्र माना जाता है।
कथा – वज्रनाभ द्वारा प्रतिष्ठित दिव्य स्वरूप
वृन्दावन के प्राचीनतम वैष्णव मंदिरों में से एक, यह धाम अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। परम्परा के अनुसार: मूल विग्रह वज्रनाभ (श्रीकृष्ण के पर–नाती) द्वारा प्रतिष्ठित माना जाता है। यहाँ का स्वरूप मदन–मोहन कहलाता है क्योंकि वे मन को मोह लेने वाले अनुपम सौन्दर्य और अद्भुत शांति के प्रतीक हैं। यह मंदिर सनातन भक्ति धारा और छः गोस्वामी परम्परा से गहरा जुड़ा है। मदन मोहन जी की स्थिर, शांत और निर्भ्रांत मुद्रा मन को तुरंत
आत्म– वलोकन और आत्मिक अनुशासन की ओर ले जाती है।
विशेष सेवा सुझाव
“कृष्ण–नाम लेखन साधना” मदन मोहन जी के समक्ष बैठकर 108 बार “कृष्ण” लिखना मन को चमत्कारिक रूप से एकाग्र कर देता है। इससे: मन का भटकाव रुकता है, विचार–शक्ति शुद्ध होती है , ध्यान और जप में गहराई आती है , यह साधना विशेष रूप से विद्यार्थी, साधक और मानसिक शांति खोजने वालों के लिए अत्यंत कल्याणकारी मानी जाती है।
स्थान: वृन्दावन की ऊँची पहाड़ी (Kaliya Ghat के पास)
निकट स्टेशन: Mathura Junction / Vrindavan
मंदिर परिवेश: प्राचीन, शांत और साधना के लिए अनुकूल
आसपास के धाम: गोविंद देव जी मंदिर, राधा–वल्लभ मंदिर
महाशयन उत्सव
ब्रज की होली
कार्तिक मास दीपदान
झूलन उत्सव (सीमित रूप में)
राधा रानी की जन्मभूमि – प्रेम का शाश्वत धाम बरसाना वह पावन धरा है जहाँ श्रीराधा रानी, श्रीकृष्ण की सर्वोच्च प्रिया, ने अवतार लिया। यह स्थान अनंत प्रेम, करुणा, माधुर्य और समर्पण का प्रतीक है — क्योंकि कृष्ण–भक्ति राधा–भाव के बिना पूर्ण नहीं।
उत्पत्ति / लीला – राधा रानी का आनन्द–निकेतन
बरसाना को “वरसाना” भी कहा जाता है — जिसका अर्थ है ईश्वर का वरदान। , पर्वत की चार पहाड़ियों को राधा–कृष्ण के चार दशक (चार दिशाओं) से जोड़ा जाता है। शास्त्रों में वर्णित है कि यहीं से रास–लीला, प्रेम–ऋतु, लाड़–प्यार, और मधुर–शृंगार की धारा प्रवाहित हुई। बरसाना की लठमार होली केवल उत्सव नहीं — यह राधा–कृष्ण की हास–लीला का अमृत अवशेष है। यह धाम याद दिलाता है—
“जहाँ राधा हैं, वहीं कृष्ण का पूर्ण स्वरूप प्रकट होता है।”
विशेष सेवा सुझाव
राधे–नाम जप” मंदिर परिसर में 108 बार , यह साधना हृदय में प्रेम, करुणा और भक्ति की कोमलता स्थापित करती है। राधा रानी का नाम स्वयं में आत्मशुद्धि का महामंत्र माना गया है।
स्थान: बरसाना, मथुरा जनपद
मंदिर स्थिति: पहाड़ी पर सीढ़ियों का लम्बा मार्ग, परन्तु अत्यंत पवित्र अनुभव
निकट शहर: कोसी कलां, मथुरा
निकट धाम: नंदगाँव, कुसुम सरोवर, राधा कुंड
लठमार होली (विश्व–प्रसिद्ध) : राधा–कृष्ण की हास–लीला पर आधारित यह होली बरसाना–नंदगाँव की अद्वितीय परंपरा है।
राधाष्टमी: राधा रानी का जन्मोत्सव — दिव्य शृंगार और मधुर कीर्तन से अनुपम दृश्य।
झूलन उत्सव : श्रीजी के झूले के दर्शन — अत्यंत माधुर्यपूर्ण।
जहाँ स्वयं गिरिराज — श्रीकृष्ण का प्रत्यक्ष स्वरूप हैं गोवर्धन वह दिव्य भूमि है जहाँ गिरिराज जी स्वयं श्रीकृष्ण के अंग–स्वरूप माने जाते हैं। ब्रज में कहा जाता है— “गोवर्धन कृष्ण नहीं, कृष्ण स्वयं गोवर्धन हैं।”
यह धाम रक्षा, कृपा, विनम्रता और दिव्य शरणागति की अद्वितीय अनुभूति प्रदान करता है।
कथा – इन्द्र–गर्व का नाश और शरणागति का संदेश जब इन्द्र ने ब्रजवासियों पर प्रलयकारी वर्षा की, तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी उँगली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर पूरा ब्रज सुरक्षित कर दिया। उन्होंने कहा— “गिरिराज मेरी देह हैं; इनकी पूजा ही सच्ची मेरी पूजा है।”
यह लीला सिखाती है – शरण में आने वालों की रक्षा निश्चित है। अहंकार का अंत होता है और विनम्रता का शासन। ईश्वर साधारण प्रतीत होने वाली चीज़ों को भी दिव्यता से भर देते हैं।
विशेष सेवा – गोवर्धन परिक्रमा
“एक परिक्रमा — चाहे छोटी ही क्यों न हो — कृपा का अनुभूतिपूर्ण प्रभाव दे जाती है।”
परिक्रमा तीन प्रकार की होती है:
भक्त मानते हैं कि हर कदम विघ्नों को काटता है और कृपा को बढ़ाता है।
(पूरी परिक्रमा 5–7 घंटे में सम्पन्न होती है।)
गोवर्धन पूजा / अन्नकूट उत्सव
कार्तिक मास दीपदान
गिरिराज शयन–जागरण उत्सव परिक्रमा मेला
भावार्थ
“जिसने गोवर्धन उठाया, वह आज भी हमारे सभी बोझ उठाते हैं।
हर चिंता, हर बाधा, हर भय — गिरिराज के चरणों में हल्के हो जाते हैं।”
जहाँ कृष्ण ने अपना राज्य स्थापित किया — ‘राजाधिराज द्वारकाधीश’ द्वारका वह पावन नगरी है जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने मथुरा से प्रस्थान के बाद अपना राजवंश और शासन स्थापित किया। यहाँ वे राजा नहीं — राजाधिराज, धर्म के संरक्षक और योगेश्वर के रूप में पूजे जाते हैं। द्वारका को “स्वर्ग समान नगर” कहा जाता है —जहाँ भक्ति, वैभव, समुद्री शांति और दिव्यता एक साथ अनुभूत होते हैं।
उत्पत्ति / कथा – वज्रनाभ द्वारा प्रतिष्ठित दिव्य स्वरूप
मंदिर के शिखर पर ध्वज–दर्शन मन को अपार शक्ति देते हैं , समुद्र की लहरों में श्रीकृष्ण की ऊर्जा का स्पंदन , गर्भगृह में शांत, तेजस्वी और राजसी श्रीकृष्ण द्वारका की हवाओं में अद्भुत दिव्य विस्तार की अनुभूति
स्थान: द्वारका नगर, गुजरात
निकट हवाई अड्डा: जामनगर (लगभग 130 किमी), राजकोट (लगभग 225 किमी)
रेलवे: द्वारका रेलवे स्टेशन (देश के प्रमुख शहरों से कनेक्टेड)
सड़क मार्ग: जामनगर, ओखा, पोरबंदर, राजकोट से उत्कृष्ट कनेक्टिविटी
जन्माष्टमी उत्सव (बहुत भव्य)
अन्नकूट
ध्वजारोहण समारोह
होली / फाल्गुन महोत्सव
कार्तिक मास दीपदान
भावार्थ
“यह वह धाम है जहाँ कृष्ण केवल भगवान नहीं , धर्मराज, नीति–नियंता और विश्व के मार्गदर्शक बनकर विराजते हैं।”
ISO 9001:2015 Certified
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